09 दिसंबर 2016

नोटबंदी: संदिग्ध फायदे, निश्चित नुकसान

आनंद तेलतुंबड़े बता रहे हैं कि किस तरह नोटबंदी के फैसले ने लोगों के लिए अभूतपूर्व परेशानियां खड़ी की हैं और यह भाजपा के लिए वाटरलू साबित होनेवाली है. अनुवाद: रेयाज़ उल हक

प्रधानमंत्री मोदी द्वारा 500 और 1000 रुपए के करेंसी नोटों को बंद करने के फैसले से होने वाली तबाही और मौतों की खबरें पूरे देश भर से आ रही हैं. एक ऐसे देश में जहां कुल लेनदेन का 97 फीसदी नकदी के ज़रिए किया जाता है, कुल करेंसी में से 86.4 फीसदी मूल्य के नोटों को अचानक बंद करने से अफरा-तफरी पैदा होना लाजिमी था. अभी तक 70 मौतों की खबरें आ चुकी हैं. पूरी की पूरी असंगठित अर्थव्यवस्था ठप पड़ी हुई है, जो भारत की कुल कार्यशक्ति के 94 फीसदी और सकल घरेलू उत्पाद का 46 फीसदी का हिस्सेदार है. पहले से बदहाली झेल रही ग्रामीण जनता इस बात से डरी हुई है कि उसके बचाए हुए पैसे रद्दी कागज में तब्दील हो रहे हैं. उनमें से कइयों ने तो कभी बैंक का मुंह भी नहीं देखा है. बैंकों के बाहर अपनी खून-पसीने की कमाई को पकड़े हुए लोगों की लंबी कतारें पूरे देश भर में देखी जा सकती हैं. मध्य वर्ग और मोदी भक्तों की शुरुआती खुशी हकीकत की कठोर जमीन पर चकनाचूर हो गई. लेकिन अब तक की सबसे कठोर टिप्पणी मनमोहन सिंह की ओर से आई है, जिनके पास रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया के पूर्व गवर्नर, पूर्व वित्त मंत्री और दो बार पूर्व प्रधानमंत्री रहने के नाते मोदी के इस तुगलकी फरमान का जायजा लेने के लिहाज से एक ऐसी साख है जो और किसी के पास नहीं है. उन्होंने नोटबंदी के इस कदम को “भारी कुप्रबंधन” कहा और इसे “व्यवस्थित लूट और कानूनी डाके” का मामला बताते हुए राज्य सभा उन्होंने कहा कि यह देश के जीडीपी को दो फीसदी नीचे ले जाएगा. ऐसा कहने वाले वे अकेले नहीं हैं. अर्थशास्त्रियों, जानकारों और चिंतकों की एक बड़ी संख्या ने भारत की वृद्धि में गिरावट की आशंका जताई है. उनमें से कुछ ने 31 मार्च 2017 को खत्म हो रही छमाही के लिए इसमें 0.5 फीसदी गिरावट आने का अनुमान लगाया है. लेकिन आत्ममुग्ध मोदी पर इन सबका कोई असर नहीं पड़ेगा, उल्टे वह उन सभी लोगों को राष्ट्र-विरोधी बता देंगे जो इस तबाही लाने वाले कदम पर सवाल उठा रहे हैं. यह सब देख कर सैमुअल जॉनसन की वह मशहूर बात याद आती है कि देशभक्ति लुच्चे-लफंगों की आखिरी पनाहगाह होती है.

इस अजीबोगरीब दुस्साहस के असली मकसद के बारे में किसी को कोई संदेह नहीं है. यह उत्तर प्रदेश, पंजाब, गोवा और मणिपुर में आनेवाले चुनावों के लिए उनकी छवि को मजबूत करने के लिए चली गई एक तिकड़म थी. चुनाव के पहले किए गए सभी वादे अधूरे हैं, तथाकथित सर्जिकल स्ट्राइक समेत उनके सभी कदम बुरी तरह नाकाम रहे हैं, जनता खाली जुमलेबाजियों और बड़बोलेपन से ऊब गई है. ऐसे में अब कुछ नाटकीय हरकत जरूरी थी. विपक्षी दल चुनावों के दौरान जनता को मोदी के इस चुनावी वादे की याद जरूर दिलाते कि उन्होंने 100 दिनों के भीतर स्विस बैंकों में जमा सारा गैरकानूनी धन लाकर हरेक के खाते में 15 लाख रुपए डालने की बात की थी. यह कार्रवाई यकीनन इस दलील की हवा निकालने के लिए और यह दिखाने के लिए ही की गई कि सरकार अर्थव्यवस्था को भ्रष्टाचार मुक्त करने के लिए साहसिक कदम उठाने की ठान चुकी है. अफसोस कि इसने पलट कर उन्हीं को बुरी तरह नुकसान पहुंचाया. इसने लोगों के लिए जैसी अभूतपूर्व परेशानियां खड़ी की हैं, उससे यह बात पक्की है कि इससे भाजपा को आने वाले चुनावों में भारी नुकसान उठाना पड़ेगा. भले ही वह विपक्षी दलों की जमा नकदी को रद्दी बना देने और इस तरह उन्हें कमजोर करने में कामयाब रही है.

जाली अर्थव्यवस्था

मोदी ने गैरकानूनी धन और भ्रष्टाचार पर चोट करने, नकली नोटों के नाकाम करने और आतंक पर नकेल कसने का दावा किया है. अब तक अनेक अर्थशास्त्रियों ने इन दावों की बेईमानी को बखूबी उजागर किया है. जैसा कि छापेमारी के आंकड़े दिखाते हैं, आय से अधिक संपत्तियों में नकदी का हिस्सा महज 5 फीसदी है. इनमें जेवर भी शामिल हैं जिनका हिसाब नकदी के रूप में लगाया जाता है. अगर नोटबंदी का कोई असर पड़ा भी तो इससे गैरकानूनी धन का बहुत छोटा सा हिस्से प्रभावित होगा. यह थोड़ी सी नकदी अमीरों के हाथ में होती है, जो इसका इस्तेमाल गैर कानूनी धन को पैदा करने और चलाने वाली विशालकाय मशीन के कल-पुर्जों में चिकनाई के रूप में करते हैं. गैरकानूनी धन असल से कम या ज्यादा बिलों वाली विदेशी गतिविधियों (बिजनेसमेन), किराए, निवेश और बॉन्ड आदि गतिविधियों (राजनेता, पुलिस, नौकरशाह) और आमदनी छुपाने के अनेक तरीकों (रियल एस्टेट कारोबारी, निजी अस्पताल, शिक्षा के सेठ) के जरिए बनाया जाता है. इस धन को कानूनी बनाने के अनेक उपाय हैं, जिनका इस्तेमाल करते हुए छुटभैयों (कागजों पर चलने वाली अनेक खैराती संस्थाएं यही काम करती हैं) से लेकर बड़ी मछलियां तक करों की छूट वाले देशों के जरिए भारत में सीधे विदेशी निवेश के रूप में वापस ले आती हैं. गैर कानूनी धन पैदा करने और चलाने के इन उपायों पर नोटबंदी का कोई असर नहीं पड़ेगा.

नोटबंदी से नकली नोटों की समस्या पर काबू पाया जा सकता है, अगर यह उतनी बड़ी समस्या हो. लेकिन कोलकाता स्थित भारतीय सांख्यिकी संस्थान (आईएसआई) की रिपोर्ट के मुताबिक जितनी करेंसी चलन में है, उसका महज 0.002 फीसदी मूल्य के नोट यानी 400 करोड़ रुपए ही नकली नोटों में हैं, जो इतने ज्यादा नहीं है कि उनसे अर्थव्यवस्था की सेहत पर कोई असर पड़े. आईएसआई रिपोर्ट में कभी भी नकली नोटों से निजात पाने के लिए नोटबंदी का सुझाव नहीं दिया. अगर सरकार को नकली नोटों की चिंता थी, तो नोटबंदी के बाद आने वाले नए नोटों में सुरक्षा के बेहतर उपाय होते. लेकिन ऐसा भी नहीं किया गया. रिजर्व बैंक ने खुद कबूल किया है कि 2000 के नए नोटों को बिना किसी अतिरिक्त सुरक्षा विशेषता के ही जारी किया जा रहा है. आतंकवादियों के पैसों की दलील पूरी तरह खोखली है. अगर आतंकवादियों के पास नकदी हासिल करने का कोई ज़रिया है, तो वे नए नोटों से निबटने के रास्ते भी उनके पास होंगे. इस तरह नोटबंदी के पीछे मोदी के आर्थिक दावे पूरी तरह धोखेबाजी हैं. इसके अलावा नए नोटों को छापने पर अंदाजन 15,000-18,000 करोड़ रुपए का खर्च अलग से हुआ और फिर हंगामे से अर्थव्यवस्था को भारी नुकसान भी हुआ और यह स्थिति तब तक बनी रहेगी जब हालात स्थिर नहीं होते.

‘स्वच्छ भारत’ 

शगूफे छोड़ते हुए मोदी ने नोटबंदी के फैसले को अपने स्वच्छ भारत अभियान से जोड़ दिया, जबकि उन्हें अच्छी तरह पता है कि इस अभियान का भी कोई खास नतीजा नहीं निकल पाया है. अगर उन्होंने इस अभियान पर खर्च होने वाली कुल रकम का आधा भी भारत को रहने के लायक बनाने वाले दलितों को दे दिया होता तो बहुत कुछ हासिल किया जा सकता था. लेकिन जहां दलितों द्वारा मैला ढोने की प्रथा के खात्मे की मांग के लिए संघर्ष जारी है, मोदी अपने स्वच्छ भारत का ढोल पीट रहे हैं. वे भारत को भ्रष्टाचार और गंदे धन से मुक्त कराने का दावा करते हैं. उनके सत्ता में आने के लिए वोट मिलने की वजहों में से एक संप्रग दो सरकार के दौरान घोटालों की लहर भी थी, जिसका कारगर तरीके से इस्तेमाल करते हुए उन्होंने देश को पारदर्शी बनाने और ‘बहुत कम सरकारी दखल के साथ अधिकतम प्रशासन’ का वादा किया था. वे अपना आधा कार्यकाल बिता चुके हैं और उनके शासन में ऊंचे किस्म के भ्रष्टाचार की फसल भरपूर लहलहाती हुई दिख रही है. भ्रष्टाचार के मुहाने यानी राजनीतिक दल अभी भी अपारदर्शी हैं और सूचना का अधिकार के दायरे से बाहर हैं. ‘पनामा लिस्ट’ में दिए गए 648 गद्दारों के नाम अभी भी जारी नहीं किए गए हैं. उनकी सरकार ने बैंकों द्वारा दिए गए 1.14 लाख करोड़ रुपए के कॉरपोरेट कर्जों को नन परफॉर्मिंग असेट्स (एनपीए) कह कर माफ कर दिया है. सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों का एनपीए 11 लाख करोड़ है, लेकिन कॉरपोरेट लुटेरों के खिलाफ कोई भी कार्रवाई नहीं की जा रही है. कॉरपोरेट अरबपतियों का सीधा कर बकाया 5 लाख करोड़ से ऊपर चला गया है, लेकिन मोदी ने कभी भी इसके खिलाफ ज़ुबान तक नहीं खोली. पिछले दशक के दौरान उनको करों से छूट 40 लाख करोड़ से ऊपर चली गई, जिसकी सालाना दर मोदी के कार्यकाल के दौरान 6 लाख करोड़ को पार कर चुकी है, जो संप्रग सरकार के दौरान 5 लाख करोड़ थी. मोदी अपने आप में कॉरपोरेट भ्रष्टाचार के भारी समर्थक रहे हैं, जो गैरकानूनी धन का असली जन्मदाता है.

यहां तक कि यह भी संदेह किया जा रहा है कि नोटबंदी में भी भारी भ्रष्टाचार हुआ है. इस फैसले को लेकर जो नाटकीय गोपनीयता बरती गई, वह असल में लोगों को दिखाने के लिए थी. इस फैसले के बारे में भाजपा के अंदरूनी दायरे को पहले से ही पता था, जिसमें राजनेता, नौकरशाह और बिजनेसमेन शामिल हैं. इसको 30 सितंबर को खत्म होने वाली तिमाही के दौरान बैंकों में पैसे जमा करने में आने वाली उछाल में साफ-साफ देखा जा सकता है. खबरों के मुताबिक भाजपा की पश्चिम बंगाल ईकाई ने घोषणा से कुछ घंटों पहले अपने बैंक खाते में कुल 3 करोड़ रुपए जमा किए. एक भाजपा नेता ने नोटबंदी के काफी पहले ही 2000 रु. के नोटों की गड्डियों की तस्वीरें पोस्ट कर दी थी और एक डिजिटल पेमेंट कंपनी ने 8 नवंबर 2016 की रात 8 बजे होने वाली घोषणा की अगली सुबह एक अखबार में नोटबंदी की तारीफ करते हुए पूरे पन्ने का विज्ञापन प्रकाशिक कराया. असल में, नोटबंदी ने बंद किए गए नोटों को कमीशन पर बदलने का एक नया धंधा ही शुरू कर दिया है. इसलिए इसमें कोई हैरानी नहीं है कि ट्रांस्पेरेंसी इंटरनेशनल द्वारा भारत की रैंकिंग में मोदी के राज में कोई बदलाव नहीं आया है जो 168 देशों में 76वें स्थान पर बना हुआ है.

आत्ममुग्ध बेवकूफी

सिर्फ एक पक्का आत्ममुग्ध ही ऐसी बेवकूफी कर सकता है. इससे भारत के संस्थागत चरित्र का भी पता लगता है, जो सत्ता के आगे झुकने को तैयार रहता है. मोदी को छोड़ दीजिए, यह वित मंत्रालय के दिग्गजों और खास कर आरबीआई के गवर्नर उर्जित पटेल की हैसियत को भी उजागर करता है, जो न सिर्फ अपने पद की प्रतिष्ठा को बनाए रखने में नाकाम रहे हैं, बल्कि जिन्होंने यह बदनामी भी हासिल की है कि वे पेशेवर रूप से अक्षमता हैं. ऐसा मुमकिन नहीं होगा कि आरबीआई के मुद्रा विशेषज्ञ इस फैसले के दोषपूर्ण हिसाब-किताब को नहीं देख पाए होंगे, लेकिन जाहिर है कि वे साहेब की मर्जी के आगे झुक गए. नोटबंदी भ्रष्टाचार का इलाज नहीं है, लेकिन इतिहास में कई शासक इसे आजमा चुके हैं. हालांकि उन्होंने जनता के पैसे के साथ इसे कभी नहीं आजमाया. आखिरी बार मोरारजी देसाई ने 1978 में 1000 रुपए के नोट को बंद किया था, जो आम जनता के बीच आम तौर पर चलन में नहीं था. अपनी क्रयशक्ति में यह आज के 15,000 रुपयों के बराबर था. यह तब प्रचलित धन का महज 0.6 फीसदी था, जबकि आज की नोटबंदी ने कुल प्रचलित धन के 86.4 फीसदी को प्रभावित किया है.

अपनी विदेश यात्राओं के दौरान मोदी हमेशा ही अपनी जन धन योजना की उपलब्धियों की शेखी बघारते रहे हैं, जो संप्रग सरकार की वित्तीय समावेश नीतियों का ही महज एक विस्तार है. उन्होंने सिर्फ गिनीज़ बुक ऑफ वर्ल्ड रेकॉर्ड्स के लिए बैंकों को खाते खोलने पर मजबूर किया. जुलाई 2015 में किए गए एक सर्वेक्षण के मुताबिक 33 फीसदी ग्राहकों ने बताया कि जन धन योजना का खाता उनका पहला खाता नहीं था और विश्व बैंक की रिपोर्ट के मुताबिक 72 फीसदी खातों में एक भी पैसा नहीं था. विश्व बैंक-गैलप ग्लोबल फिनडेक्स सर्वे द्वारा किए गए एक और सर्वेक्षण में दिखाया गया कि कुल बैंक खातों का करीब 43 फीसदी निष्क्रिय खाते हैं. यहां तक कि रिजर्व बैंक भी कहता है कि सिर्फ 53 फीसदी भारतीयों के पास बैंक खाते हैं और उनका सचमुच उपयोग करने वालों की संख्या इससे भी कम है. ज्यादातर बैंक शाखाएं पहली और दूसरी श्रेणी के शहरों में स्थित हैं और व्यापक ग्रामीण इलाके में सेवाएं बहुत कम हैं. ऐसे हालात में सिर्फ एक आत्ममुग्ध इंसान ही होगा जो भारत में बिना नकदी वाली एक कैशलेस अर्थव्यवस्था के सपने पर फिदा होगा. यह सोचना भारी बेवकूफी होगी कि ऐसे फैसलों से भाजपा लोगों का प्यार पा सकेगी.

कहने की जरूरत नहीं है कि दलितों और आदिवासियों जैसे निचले तबकों के लोगों को इससे सबसे ज्यादा नुकसान उठाना पड़ा है और वे भाजपा को इसके लिए कभी माफ नहीं करेंगे. भाजपा ने अपने हनुमानों (अपने दलित नेताओं) के जरिए यह बात फैलाने की कोशिश की है कि नोटबंदी का फैसला असल में बाबासाहेब आंबेडकर की सलाह के मुताबिक लिया गया था. यह एक सफेद झूठ है. लेकिन अगर आंबेडकर ने किसी संदर्भ में ऐसी बात कही भी थी, तो क्या इससे जनता की वास्तविक मुश्किलें खत्म हो सकती हैं या क्या इससे हकीकत बदल जाएगी? बल्कि बेहतर होता कि भाजपा ने आंबेडकर की इस अहम सलाह पर गौर किया होता कि राजनीति में अपने कद से बड़े बना दिए गए नेता लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ा खतरा होते हैं.

23 नवंबर 2016

नोटबंदी में बड़ी कंपनियों को लूट की छूट

दिलीप ख़ान

गुरुवार से सरकार ने बिग बाज़ार की पेशकश पर नई व्यवस्था लागू की है। अब बैंक और एटीएम के अलावा बिग बाज़ार से भी लोग कैश निकाल सकेंगे। शुरू में देश भर में फैली 258 दुक़ानों में ये व्यवस्था लागू होगी। बाद में इस दायरे को और बढ़ाया जाएगा। स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया इसमें बिग बाज़ार की मदद कर रहा है। देखने-सुनने में शुरुआती तौर पर तो यही लगता है कि इससे लोगों को सहूलियत होगी। लोग बैंक और एटीएम के साथ-साथ पेट्रोल पंप और बिग बाज़ार से भी पैसे निकाल सकेंगे, लेकिन क्या ये वाकई सहूलियत का मामला है? क्या स्टेट बैंक ने सचमुच लोगों की परेशानी कम करने के लिए इस फ़ैसले को मंजूरी दी है? 

बिग बाज़ार में कई बड़े उद्योगपतियों के पैसे

 नोटबंदी के बाद सरकारी संस्थानों को सुदृढ़ करने के बजाए बिग बाज़ार जैसे निजी खिलाड़ियों को बैंक जैसी शक्ति क्यों दी जा रही है? सरकार ने सहकारी बैंकों के लाख विरोध के बावजूद अब तक उन्हें पुराने नोट बदलने की शक्ति नहीं दी है। केरल में विधान सभा का विशेष सत्र बुलाना पड़ा, महाराष्ट्र में तीन ज़िलों के सहकारी बैंकों ने इसे बॉम्बे हाई कोर्ट में चुनौती दे दी। बिहार के सहकारी बैंककर्मियों ने 25 तारीख़ को हड़ताल की धमकी दे दी, लेकिन सरकार के कानों में जूं तक नहीं रेंग रही, जबकि करोड़ों लोग सहकारी बैंकों पर निर्भर हैं। तो ऐसा क्या है बिग बाज़ार में जो सहकारी बैंक में नहीं है?


पहले दिन से ये प्रचार किया जा रहा है कि नोटबंदी से ग़रीब और मध्यवर्ग को दीर्घकालीन फ़ायदा होगा। हम इन आंकड़ों पर अलग से बात कर लेंगे कि ये फ़ैसला कैसे ग़रीब विरोधी है, लेकिन फ़िलहाल हम इस पर ध्यान दें कि बिग बाज़ार को पैसे निकालने का मंच बनाने से किसको फ़ायदा होगा और किसको नुकसान? मान लीजिए आपने बिग बाज़ार से 2000 रुपए निकाले, तो ज़रूरत का सामान चारों तरफ़ देखकर आप ख़रीददारी भी करेंगे। नहीं करेंगे तो उनके कर्मचारी, जिनको इसी काम का वेतन मिलता है, आपको ज़रूर ऑफर करेंगे कि आप फलाना सामान ख़रीद लीजिए। इस तरह बिग बाज़ार से आप निकालने जाएंगे 2000 और घर लेकर आएंगे 1000 या फिर पांच सौ। नकदी के मामले में ख़ाली हाथ भी लौट सकते हैं। जो सामान आप मोहल्ले की किराना दुक़ान से ख़रीदते थे, वो आप बिग बाज़ार से ख़रीदेंगे। वहां आपको न कैश की दिक़्क़त है और न ही कार्ड एक्सेप्ट नहीं होने की। मोहल्ले का छोटा दुक़ानदार आपको ये सुविधा नहीं दे सकता। ये सुविधा बड़ा रिटेल चेन ही दे सकता है। बिग बाज़ार आपको दे रहा है। बिग बाज़ार की बिक्री बढ़ेगी। वैसे ही चारों तरफ़ ख़बरों के ज़रिए ये प्रचार हो रहा है कि 'आप पैसे बिग बाज़ार से भी निकाल सकते हैं'। बिग बाज़ार के लिए बिना पैसा ख़र्च किए इससे बढ़िया विज्ञापन क्या हो सकता है? 

अब एक बार बिग बाज़ार की मालिकाना संरचना समझ लेते हैं। बिग बाज़ार को चलाने वाली मदर कंपनी का नाम है फ्यूचर ग्रुप। किशोर बियानी इसके मुख्य कार्यकारी अधिकारी हैं। 2001 में इसकी स्थापना हुई थी और तबसे बिग बाज़ार देश के सैंकड़ों शहरों में अपनी शाखा खोल चुका है। 2015 में एयरटेल के मालिक सुनील भारती मित्तल की कंपनी भारती रिटेल और फ्यूचर ग्रुप मर्ज हो गए। यानी एक हो गए। इस तरह ये कंपनी 15 हज़ार करोड़ रुपए के टर्नओवर वाली कंपनी बन गई। 
सहकारी बैंकों को नोट बदलने की शक्ति नहीं दी गई

मई 2012 में आदित्य बिड़ला समूह को फ्यूचर ग्रुप वालों ने पेंटालूंस की 51.1 फ़ीसदी हिस्सेदारी दे दी थी। 8000 करोड़ रुपए में ये डील हुई। फ्यूचर ग्रुप ने अपने क़र्ज़ का बोझ कम करने के लिए ये फ़ैसला किया। 


जब भारती ग्रुप के साथ फ्यूचर ग्रुप का मिलाप हुआ तो ‘इज़ीडे’ और बिग बाज़ार एक हो गए। ये जो ‘इज़ीडे’ है, ये भारत में वालमार्ट की सहयोगी कंपनी है। यानी बिग बाज़ार का दांव बहुत ऊपर तक लगा हुआ है। नोटबंदी से उपजे हालात में फ़ायदा लूटने के तार यहां से अमेरिका तक जुड़े हुए हैं। अगर आप बिग बाज़ार में उद्योगपतियों की हिस्सेदारी तलाशेंगे तो कई बड़े नाम आपको एक साथ मिल जाएंगे। इनमें किशोर बियानी और सुनील भारती मित्तल के अलावा आदित्य बिड़ला तो हैं हीं, गोदरेज़ भी हैं और वॉलमार्ट भी हैं। फ्यूचर ग्रुप में इटली के जेनरली ग्रुप, फ्रांस के सेलियो, अमेरिका के स्टैपलेस, ब्रिटेन के क्लार्क समेत कई विदेशी कंपनियों ने साझा उपक्रम के तहत पैसे लगा रखा है। यही नहीं, गुजरात और पंजाब में फ्यूचर ग्रुप ‘आधार रिटेल’ चलाती है और इसमें गोदरेज इसका साझेदार है। 

इज़ी डे अब बिग बाज़ार वालों का है
इसी तरह बिग एप्पल को चार साल पहले किशोर बियानी ने ख़रीदा था। यानी KB’s फेयर प्राइस भी इस डील के बाद बिग बाज़ार वालों का हो गया। मुनीष हेमराजन से 62 करोड़ रुपए में ये सौदा पटा था। प्लानेट स्पोर्ट्स नाम की कंपनी भी फ्यूचर ग्रुप की है और इसमें यूरोप की कुछ कंपनियों ने भी पैसे लगा रखे हैं। यही नहीं, EZone online, Fool hall, Home Town, I am in, Central जैसे कई रिटेल स्टोर्स के मालिक किशोर बियानी हैं। 


नोटबंदी के बाद पेटीएम जैसी कंपनियों के धंधे बुलंद हुए तो नरेन्द्र मोदी की फोटो के साथ कई अख़बारों ने कंपनी ने इश्तेहार छापा। पेटीएम में चीनी कंपनी अलीबाबा का बड़ा शेयर है। नोटबंदी का पेटीएम को बड़ा फ़ायदा मिला है। अब बारी बिग बाज़ार की है। 

20 अक्तूबर 2016

मोदी जी, ऐसे लड़ेंगे आतंकवाद से?

- दिलीप ख़ान

ब्रिक्स में भारत का सबसे बड़ा एजेंडा क्या था? इसका जवाब टीवी देखने वाला कोई भी व्यक्ति दे सकता है। हर कोई जानता है कि ब्रिक्स और बिम्सटेक देशों के नेताओं के साथ प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने सबसे ज़्यादा पाकिस्तान और आतंकवाद की बात की। मोदी ने यहां तक कहा कि आतंकवाद की निंदा से आगे बढ़कर दुनिया को अब कार्रवाई की तरफ़ आगे बढ़ना चाहिए। दुनिया से भारत ने इस दिशा में सहयोग मांगा। उरी हमले के बाद जिस तरह का माहौल बना, उसमें भारत ने पहले ही ये संकेत दे दिया था कि ब्रिक्स सम्मेलन से पाकिस्तान को काटने के लिए सार्क के बदले बिम्सटेक देशों को न्यौता दिया जाएगा। न्यौता दिया गया और पाकिस्तान को सम्मेलन से काट दिया गया। अगर इसे कूटनीतिक जीत मान लें, तो उम्मीद बंधी थी कि ब्रिक्स में भारत लश्कर-ए-तैय्यबा समेत जैश-ए-मोहम्मद जैसे आतंकवादी संगठनों के ख़िलाफ़ वैश्विक सहयोग हासिल करने में क़ामयाबी पाएगा। लेकिन क्या ये हो पाया?

ज़ाहिर है कि नहीं। गोवा घोषणापत्र में जिन आतंकवादी संगठनों के नाम हैं, वो हैं- ISIL और अल नुसरा। यहीं असल पेंच फंसता है। अल नुसरा के नाम पर ज़रा ग़ौर कीजिए। इस संगठन को अगर आपने फॉलो किया है, तो शायद इसके बारे में कुछ बुनियादी जानकारी आपको होगी। ये संगठन सीरिया में सक्रिय है और दावा करता है कि वो आईएस और सीरियन सरकार, दोनों के ख़िलाफ़ लड़ाई लड़ रहा है। सीरिया में मोटे तौर पर तीन पार्टियां सक्रिय हैं।

1. सीरिया की बशर अल-असद सरकार। असद को रूस और ईरान का समर्थन हासिल है।
2. फ्री सीरियन आर्मी+ अल नुसरा+ अमेरिका+ फ्रांस+ सऊदी+ तुर्की+ और भी कई संगठन
3. आईएसआईएस

छोटी-मोटी और भी पार्टियां हैं, लेकिन मोटे तौर पर यही तीन गुट आपस में लड़ रहे हैं। बशर अल-असद सरकार बाक़ी दोनों से लड़ रही है। फ्री सीरियन आर्मी भी बाक़ी दोनों से और आईएसआईएस तो ज़ाहिर तौर पर बाक़ी दोनों से लड़ ही रहा है। यानी हर किसी के दो-दो दुश्मन हैं, लेकिन जब सवाल आता है ISIS का तो उसमें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर रूस और अमेरिका दोनों ये दावा करते हैं कि वो सीरिया में ‘शांति बहाली’ और ISIS को नेस्तनाबूद करने के लिए बम बरसा रहे हैं।

पार्टी-1.


रूस अल नुसरा फ्रंट को आतंकवादी संगठन मानता है। फ्री सीरियन आर्मी में शामिल कई गुटों को रूस आतंकवादी मानता है। और यही वजह है कि ब्रिक्स सम्मेलन के बाद जारी गोवा घोषणापत्र में रूस ने अल नुसरा का नाम शामिल किया। अब सवाल ये है कि इसमें भारत कहां खड़ा है और कूटनीतिक तौर पर भारत का क्या स्टैंड है? या फिर साफ़-साफ़ कहें तो भारत कहां फंस रहा है?


पार्टी-2.


जहां रूस एक तरफ़ अल नुसरा को आतंकवादी संगठन मानता है, वहीं अमेरिका का रुख बिल्कुल उलट है। अमेरिका की रुचि ISIS के अलावा बशर अल-असद सरकार को उखाड़ फेंकना भी है। अल नुसरा फ्रंट बशर अल-असद सरकार के ख़िलाफ़ शुरू से सक्रिय रहा है। अमेरिका फ्री सीरियन आर्मी को आर्थिक सहायता और हथियार सप्लाई करता है। अल नुसरा भी इसी गुट में रहकर लड़ाई कर रहा है। ओबामा सरकार ने इस गुट को 50 करोड़ डॉलर की मदद की। सब कुछ ऑन रिकॉर्ड है।


भारत की मुश्किल


दिलचस्प ये है कि अल-क़ायदा ही सीरिया में अल नुसरा नाम से काम करता है। कुछ वक़्त पहले तक अमेरिका का दुनिया में सबसे बड़ा दुश्मन अल-क़ायदा था। फ़िलहाल ISIS है। अमेरिका सीधे तौर पर अल नुसरा के साथ गुटबंदी करने से इनकार करता रहा है, लेकिन फ्री सीरियन आर्मी के लड़ाके खुले तौर पर मानते हैं कि अल नुसरा का उन्हें समर्थन हासिल है और वो साथ में लड़ते हैं। यानी अमेरिका के सहयोगी का सहयोगी हुआ अल नुसरा। अब गोवा घोषणापत्र में अल नुसरा को आतंकवादी संगठन माना गया है।

भारत ने गोवा घोषणापत्र के मुताबिक़ आतंकवाद के ख़िलाफ़ कार्रवाई का संकल्प लिया है। लेकिन दिक़्क़त ये है कि भारत जब अमेरिका के साथ द्विपक्षीय या बहुपक्षीय मंचों पर बैठता है तो आतंक के ख़िलाफ़ लड़ाई में अमेरिका और भारत का एक ही रोडमैप हो जाता है। यानी अल नुसरा के ख़िलाफ़ जहां भारत एक तरफ़ कड़ी कार्रवाई की बात करता है, वहीं दूसरी तरफ़ अल नुसरा को बढ़ावा देने में मदद करने वाले अमेरिका को पार्टनर भी मानता है। ऐसे में कैसे होगी आतंक के ख़िलाफ़ लड़ाई?

17 अक्तूबर 2016

युद्ध की बात करने वाले देशद्रोही हैं

संदीप पाण्डेय
उड़ी हमले के जवाब में हुए सर्जिकल धावे के बाद, जिसके बारे में देश को ठीक से बताया नहीं जा रहा, भारत सरकार पाकिस्तान के खिलाफ लगभग विजयी मुद्रा में आ गई है। उसी तरह जैसे 1998 में 11 मई को पोकरण नाभिकीय परीक्षण के बाद। तब भी भाजपा नेताओं के स्वर चेतावनी से लेकर धमकी भरे थे। लेकिन महीना खत्म भी नहीं हुआ और पाकिस्तान ने भी नाभिकीय परीक्षण करके दिखा दिए। इसलिए जो भारतीय सेना के पराक्रम से आत्ममुग्ध हैं उन्हें सावधानी बरतनी चाहिए। भारत ने ऐसी कोई कार्यवाही नहीं की है कि पाकिस्तान हमेशा हमेशा के लिए भारत का लोहा मान लेगा। पोकरण के नाभिकीय परीक्षण के बाद भी भारतीय सरकार ने अपने नागरिकों को यह बताया था कि अब भारत के पास ऐसा शस्त्र आ गया है कि पाकिस्तान क्या अमरीका भी हमारी तरफ नजर उठा कर नहीं देखेगा। किंतु अटल बिहारी वाजपेयी का कार्यकाल खत्म होने से पहले ही कारगिल में घुसपैठ हो गई। 
      जिस तरह पोकरण के नाभिकीय परीक्षणों की वजह से भारत और पाकिस्तान के बीच एक नाभिकीय शस्त्रों की होड़ शुरू हो गई तो दोनों ही देशों, जिनके सामाजिक मानक दक्षिण एशिया में सबसे खराब हैं, के बहुमूल्य संसाधन जो आम गरीब जनता की मूलभूत आवश्यकताओं को पूरा करने में लगने चाहिए थे, तबाही की सामग्री जुटाने में लग गए, उसी तरह भारत के सर्जिकल धावे से हथियारों की होड़ और तेज होगी। यह उम्मीद करना कि पाकिस्तान अब भारत पर हमले करने से बाज आएगा, पाकिस्तान को कम आंकना है। हथियारों की होड़ के साथ दिक्कत यह है कि वह कहां रुकेगी यह किसी को नहीं मालूम। जैसे जैसे प्रौद्योगिकी का विकास होगा एक से एक नवीन हथियार, जिनकी पेचीदगी भी बढ़कर होगी, बाजार में आएंगे। एक देश यदि इनमें से कोई हथियार खरीदता है तो दूसरे की मजबूरी हो जाती है कि वह भी उसे टक्कर देने वाला हथियार खरीदे। हथियार खरीदे तो जाते हैं सुरक्षित रहने के लिए लेकिन देखा यह जा रहा है कि हथियारों से असुरक्षा बढ़ जाती है। फिर हम और हथियार खरीदते हैं और इस तरह एक दुष्चक्र में फंस जाते हैं। पहले तो हमें सिर्फ अपनी चिंता होती है लेकिन फिर हथियारों की सुरक्षा की चिंता भी करनी पड़ती है। उदाहरण के लिए नाभिकीय हथियारों को सुरक्षित नहीं रखा गया तो उसके घोर विनाशकारी परिणाम हो सकते हैं। अमरीका को इस बात की चिंता करनी पड़ती है कि कहीं पाकिस्तान के नाभिकीय हथियार इस्लामी आतंकवादियों के हाथ में न आ जाएं।
       भारत ने ऐसा माहौल निर्मित कर दिया है कि अब भारत और पाकिस्तान की मजबूरी है कि वे नवीनतम हथियारों को हासिल करने की नई होड़ में लगेंगे। फायदा होगा उन शक्तिशाली देशों जैसे अमरीका, इजराइल, रूस, चीन, फ्रांस, आदि, का जिनसे भारत और पाकिस्तान अपने हथियार खरीदेंगे। जिन संसाधनों से वंचित जनता के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य, खाद्य सुरक्षा, आवास, शौचालयों, आदि का इंतजाम हो सकता था, जिनसे बच्चों का कुपोषण दूर हो सकता था, वे मंहगे हथियारों को खरीदने में खपेंगे। अतः भारत-पाकिस्तान के बीच युद्ध का माहौल बनाना भी दोनों देशों की गरीब जनता के हितों के खिलाफ है।
      राजनाथ सिंह ने ऐलान किया है कि 2018 तक भारत-पाकिस्तान के बीच 3,323 किलोमीटर सीमा सील कर दी जाएगी। सीमाओं को इंसान ने बनाया है। हतिहास में ये बदलती रही हैं। भारत पाकिस्तान के बीच लोगों और सामग्री का आना जाना बना रहेगा क्यों कई परिवारों की रिश्तेदारियां और कई के धार्मिक स्थल सीमा के उस पार हैं। लोग सीमा के आर-पार जाना चाहते हैं। दोनों देश सांस्कृतिक रूप से एक हैं। दुनिया में और कोई देश नहीं है जहां उत्तर भारत के बड़े हिस्से में बोली जाने वाली भाषा, जिसे भारत में हिन्दी और पाकिस्तान में उर्दू कहते हैं, समझी जाती हो। यह बड़ी अजीब बात है कि यूरोप के देशों के बीच सीमाएं खत्म कर दी गई हैं और हम अपनी सीमा को पक्का बनाना चाहते हैं। पूर्वी और पश्चिमी जर्मनी के बीच दीवार गिर गई। हम दीवार खड़ी करना चाहते हैं। यदि भविष्य में कोई ऐसी सरकारें आती हैं जो मित्रता कर लें तो इन दीवारों पर खर्च होने वाला पैसा बेकार जाएगा। इसलिए कोशिश तो यह होनी चाहिए कि सीमा खुले, न कि बंद हो। दीवार दुश्मनी का प्रतीक है और सीमा खुल जाना मित्रता का। दुश्मनियां अस्थाई होती हैं, अल्पकालिक होती हैं, मित्रता और सम्बंध लम्बे समय के लिए होते हैं। इसलिए भारत सरकार द्वारा सीमा को पक्का बनाने का निर्णय एक अविवेकपूर्ण और जन-विरोधी निर्णय है। यह भी जनता के पैसे की बरबादी है। और क्या पक्की सीमा बन जाने से आतंकवादियों का आना रुक जाएगा? वे तो फिर भी आ सकते हैं। अतः हमें समाधान ऐसा चाहिए कि आतंकवादियों का आना ही बंद हो जाए।
       युद्ध में लोग मरते हैं। हमेशा सैनिक और आतंकवादी ही नहीं मरते। जैसे हमने हाल ही में कश्मीर में देखा सुरक्षा बलों की बंदूकों से छोटे बच्चे, महिलाएं, बूढ़े भी मरते हैं। सैनिक का परिवार भी नहीं चाहता कि उसे शहीद होना पड़े। वह उसे जिंदा वापस लौटते देखना चाहता है। उसका काम है सीमा की सुरक्षा करना। शहीद तो वह विशेष परिस्थिति में होता है। सरकारें वह परिस्थिति निर्मित करती हैं जिसमें सैनिक शहीद हो सकता है या सुरक्षित भी रह सकता है। यदि सरकारें पड़ोसी देश के साथ आपसी समस्याएं नहीं सुलझा पा रही तो सैनिकों को शहीद होना पड़ सकता है। यदि सरकारें समस्याओं को सुलझाने की मंशा रखती हैं तो सैनिकों को अपनी जान की बाजी नहीं लगानी पड़ेगी। युद्ध सरकार की असफलता का प्रतीक है और शांति उसकी सफलता का। जो सरकार अपने नागरिकों की परवाह करेगी वह कभी युद्ध नहीं चाहेगी। जो नागरिकों के प्रति असंवेदनशील है वही नागरिकों की जान खतरे में डालेगी।
       पूरे देश में युद्धोन्माद की परिथिति का निर्माण करना देशभक्ति नहीं बल्कि देशद्रोह है क्योंकि वह देश को बरबादी की तरफ ले जाएगा। यह किसी जिम्मेदार सरकार की निशानी नहीं जो ऐसी परिस्थिति बनने देती है। युद्ध या युद्ध का माहौल बनाने से सरकार और भारतीय जनता पार्टी को कुछ तात्कालिक फायदे मिल सकते हैं लेकिन लम्बे समय में आम जनता का नुकसान होगा।

लेखकः संदीप पाण्डेय
उपाध्यक्ष, सोशलिस्ट पार्टी (इण्डिया)
लोहिया मजदूर भवन, 41/557 तुफैल अहमद मार्ग, नरही, लखनऊ-226001
फोनः 0522 2286423,
मो. 9506533722

27 जुलाई 2016

देश में बीफ़ पर क्या है नियम जानिए

बीफ़ देश में पिछले दो-ढाई साल से स्थाई विवाद का मुद्दा बन गया है। कुछ दक्षिणपंथी उचक्के संगठनों ने गौ-रक्षा के नाम पर जिस तरह का आतंक फैलाया है, वैसे में ये जानना ज़रूरी है कि देश में बीफ़ को लेकर क्या है नियम-क़ायदे। बिल्कुल संक्षेप में आइए देखते हैं- 

1.      केरल सब कुछ लीगल है। गाय-भैंस सब। काटना, खाना, बेचना सब लीगल।
2.      पश्चिम बंगाल- सेम टू सेम। सब लीगल।
3.      मेघालय, नगालैंड, त्रिपुरा, अरुणाचल, मिज़ोरम और सिकिक्म- सब लीगल। गाय, भैंस सब।
4.      मणिपुर- गाय काटना बैन है। खाना, बेचना, रखना लीगल है। भैंस में सब लीगल है।

5.      असम- स्लॉटर के लिए सर्टिफिकेट नहीं है तो गाय नहीं काट सकते। बाक़ी खा सकते हैं, बेच सकते हैं। भैंस के लिए सब ओके है।

6.      आंध्र प्रदेश + तेलंगाना- गाय, बछड़ा प्रतिबंधित है। सांढ और बैल को सर्टिफिकेट मिलने के बाद काटा जा सकता है, बशर्ते वो अब प्रजनन, खेती और हल चलाने के काबिल न हो। भैंस- ओके।
7.      बिहार- गाय, बछड़ा प्रतिबंधित है। 15 साल से ज़्यादा बड़े सांढ़ और बैल का स्लॉटर लीगल है। खाना, रखना वगैरह लीगल है। भैंस में तो सबकुछ लीगल है।

8.      झारखंड- गाय, बैल वगैरह काटना, मांस रखना, खाना सब प्रतिबंधित है। भैंस- ओके।
9.      गुजरात- गाय, बछड़ा, सांढ़, बैल पर प्रतिबंध है। काटना, खाना और ले जाना प्रतिबंधित है। भैंस पर कोई प्रतिबंध नहीं यानी ओके।
10.  मध्य प्रदेश- गाय, बछड़ा, सांढ़ वगैरह सब प्रतिबंधित है। भैंस ओके है।

11.  छत्तीसगढ़- गाय, बछड़ा, बैल, सांढ़ प्रतिबंधित। हर तरह से प्रतिबंधि। भैंस- ओके।
12.  उत्तर प्रदेश- गाय, बछड़े, सांढ़, बैल का स्लॉटर प्रतिबंधित। इनका मांस खाना भी प्रतिबंधित। विदेशियों को खाने की अनुमति है। सील पैक्ड डब्बे में मांस लाया जा सकता है, लेकिन सिर्फ़ विदेशियों के लिए उसे पकाया जा सकता है। भैंस में सब ओके।
13.  दिल्ली- गाय, बछड़ा, बैल, सांढ़ प्रतिबंधित है। पूरी तरह प्रतिबंधित। किसी दूसरे राज्य से भी मांस लाकर खाना मना है। भैंस- ओके।

14.  हरियाणा- गाय पर सब बैन है। खाने पर मैं श्योर नहीं हूं। भैंस- ओके है।
15.  चंडीगढ़- यहां सब प्रतिबंधित है। गाय, भैंस सब। खाना, काटना, बेचना सब।
16.  हिमाचल प्रदेश- सिर्फ़ रिसर्च के लिए काटने की अनुमति है या फिर अगर जानवर बीमार हो। बाक़ी सब ग़ैर-क़ानूनी है।

17. राजस्थान- गाय, बैल, बछड़ा, सांढ़ पर पूरी तरह प्रतिबंध। भैंस में सब ओके।
18. पंजाब- गाय का मांस बाहर से मंगाकर खा सकते हैं। पंजाब में खाने के लिए काट नहीं सकते। भैंस के लिए वही नियम है। भैंसे को निर्यात के लिए काट सकते हैं। इसलिए यहां नियम पेंचीदा है। अगर आप खा रहे हैं तो ये बता सकते हैं कि आपने बाहरी राज्यों से मंगवाया है।

19.  ओडिशा- सिर्फ़ संक्रमण वाली बीमारी से ग्रसित गाय काट सकते हैं। बाक़ी नहीं। बूढ़े बैल, सांढ़ को सर्टिफिकेट के साथ काटा जा सकता है। भैंस के लिए कोई नियम नहीं। सब ओके।
20.  महाराष्ट्र- 2015 के बाद गाय, बैल, बछड़ा, सांढ़ वगैरह काटनाक, खाना, मांस रखना ग़ैर-क़ानूनी है। पहले ये नियम सिर्फ़ गाय पर लागू था। भैंस- सब लीगल।
21.  जम्मू-कश्मीर- गाय, बैल, बछड़ा, सांढ़ को काटना, खाना, मांस रखना सब ग़ैर-क़ानूनी है। हाल ही में ये नियम बना। भैंस- ओके।

22.  कर्नाटक- गाय अगर उम्रदराज़ या फिर बीमार है तो काट सकते हैं। खाना, मांस रखना, सब लीगल है। भैंस में सब लीगल।
23. तमिलनाडु- गाय, बछड़े पर प्रतिबंध। बेकार और बूढ़ी गायों और बछड़ों का स्लॉटर ओके। खाना, मांस रखना ओके। भैंस में सब ओके।

24. गोवा- गाय मारना बैन। खाना- ओके। भैंस- ओके।

06 मई 2016

JNU: वीसी और संघ के बीच चल क्या रहा है?

- दिलीप ख़ान

बीते दिन-चार दिनों से जेएनयू प्रशासन की तरफ़ से नोटिसों की बौछार हो रही है। रोज़ाना एक नया नोटिस। कभी ‘असंवैधानिक’ भूख हड़ताल ख़त्म करने, कभी ‘बाहरियों’ को नहीं बुलाने तो कभी माइक, स्पीकर नहीं बजाने से जुड़े नोटिस। वीसी जगदेश कुमार की ‘आंदोलन विरोधी’ मंशा इसमें जितनी साफ़ दिख रही है, उसको बाज़ार में बिकने वाले 10 रुपए के खुर्दबीन से देखें तो संघ-विद्यार्थी परिषद के साथ खड़े रहने की मंशा उससे भी ज़्यादा स्पष्ट दिखती है। विद्यार्थी परिषद  ने भी वही काम किया, जो वो लोग कर रहे हैं, जिनको इन दिनों नोटिस से मारने की कोशिश की जा रही है। मिस्टर वीसी और एबीवीपी के कारिंदों की छटपटाहट नौवें दिन की भूख हड़ताल के बाद उनसे ज़्यादा तेज़ है जिनकी अंतड़ियां इन नौ दिनों में लगातार सूखती जा रही है। 10 मई के अकादमिक काउंसिल की बैठक से पहले वीसी सबकुछ सामान्य बनाने की कोशिश में तो जुटे हैं, लेकिन ग़लत रास्ते से। जेएनयू प्रशासन और एबीवीपी के बीच के संबंध सरसरी निगाह में ही पकड़ में आ जाएगा।


स्पीकर इस्तेमाल नहीं करने वाला नोटिस
जो खेल खेला जा रहा है, उसे सब देख-समझ रहे हैं, लेकिन खिलाड़ी गेंद को दर्शकों के बीच उछालकर मुग़ालते में है कि दर्शकों की नज़र सिर्फ़ गेंद पर है। चलिए, बुधवार की रात की घटना देखिए। जब जेएनयू में ABVP वाली जगह पर हलचल बिल्कुल ठुस्स थी तो ठीक बगल में पूर्वोत्तर छात्र मोर्चा जेएनयू के ख़िलाफ़ ज़हरीले डॉजियर का विरोध कर रहे थे। महीनों पुराना ये डॉज़ियर मीडिया में उस वक़्त रिलीज़ किया गया जब जेएनयू चौतरफ़ा संघ के निशाने पर है। डॉज़ियर को बनाने वाले जो लोग हैं उनका संघ की वैचारिकी के साथ संबंध महज एक गूगल सर्च का विषय है। बीजेपी के विधायक ज्ञानदेव आहूजा और जेएनयू की अमिता सिंह के बीच जेएनयू को बदनाम करने के मामले में सैद्धांतिक जुड़ाव है। ज्ञानदेव जेएनयू में कॉन्डोम गिनते रहे और अमिता सिंह जेएनयू को सेक्स रैकेट का अड्डा बताती रहीं। संघ जेएनयू को अलगाववादी तत्वों का अड्डा बताता रहा, अमिता सिंह का डॉज़ियर पूर्वोत्तर और कश्मीरी स्टूडेंट्स को चिह्नित कर अलगाववाद की इस सैद्धांतिकी पर मुहर लगाती रही।


अब ये खोज का विषय है कि ज्ञानदेव आहूजा ने अमिता सिंह से बात कर कॉन्डोम वाला बयान दिया या फिर उस बयान के बाद अमिता सिंह ने डॉज़ियर को मीडिया में लीक करवाया। लेकिन, इनके बीच की मिलीभगत सामान्य अवलोकन भर का मुद्दा है। पूर्वोत्तर छात्र मोर्चा ने इस ज़हरीले और सस्ते डॉज़ियर को जलाने के बाद जब आज़ादी चौक पर कार्यक्रम आयोजित किया तो वहां भाषण देने वालों में वो लोग भी शामिल थे, जिनकी अंतड़ियां सात दिनों की भूख के बाद बैठ चुकी थीं। लेकिन, न तो रामा नागा और न ही उमर ख़ालिद के भाषण में कहीं भी कमज़ोर होते शरीर की कोई छाया दिख रही थी। जैसे-जैसे भाषण आगे बढ़ा, वैसे-वैसे उत्साह और आवाज़ का स्तर ऊंचा होता गया। दो मिनट में ही कोई भी भांप सकता था कि आंदोलन जज़्बे और राजनीतिक प्रतिबद्धता से चलता है। राजनीतिक प्रतिबद्धता अगर शून्य हो तो खा-पीकर भी नारों के लिए कंठ से आवाज़ नहीं फूटती।

डॉज़ियर को लेकर पूर्वोत्तर छात्र मोर्चे का विरोध

वीसी के साथ जिस एबीवीपी की चर्चा शुरू में की गई है वो बेहद ज़रूरी है। ज़रूरी इसलिए क्योंकि भाषण का दौर ख़त्म होने के बाद कबीर का गायन ठीक बगल में चल रहा था और उसे सुनते और दोस्तों से गप्पें मारते हुए मैं एबीवीपी वाले ‘इलाक़े’ के क़रीब बैठा था। एक मिनट के लिए घड़ी देखी तो पाया कि 11.23 बज रहा है। घड़ी से नज़र हटी नहीं थी कि किसी गाली को कान में घुसता पाया। हरे रंग की धारीदार टीशर्ट में एबीवीपी का एक कारिंदा किसी को लगातार तेज़ आवाज़ में गाली दे रहा था। प्रतिक्रिया में सामने वाला उसे मोदीभक्त कहकर आगे निकल गया। मुझे लगा कि एबीवीपी के बाक़ी लोग उस लड़के को भद्दी गालियों के लिए डाटेंगे या कम से कम चुप कराएंगे, लेकिन हुआ उल्टा। एक मोटा सा महंथ टाइप आदमी कुर्सी पर बैठा था, जिसके अगल-बगल क़रीब दसेक लोग बैठकर खींसे निपोड़ रहे थे। वो लड़का जितनी गालियां देता,  ये दर्जन भर लोग उतना ही हंसते। आख़िरकार एक ने उसे चुप कराने की जहमत उठाई तो वो उसी पे फट पड़ा। ये सिलसिला क़रीब 15-20 मिनट तक चलता रहा और आख़िरकार हरी टीशर्ट वाले ने ये पाकर कि उसे सब नज़रअंदाज़ कर रहे हैं, आकर टेबल पर बैठ गया। 

मैं क़रीब दस साल से जेएनयू को जानता हूं, लेकिन पहली बार किसी को बिना किसी शर्म के ऐसी भद्दी गालियां पब्लिकली देते सुना। वहां के लोगों का कहना था कि वो लड़का पहले भी ऐसी हरकत कर चुका है।  बहरहाल, मैंने नज़र दौड़ाई कि क्या इस वक़्त एबीवीपी वाले हिस्से में कोई लड़की है? नहीं मिली। मैं जब भी लड़कियों को एबीवीपी में देखता हूं मुझे हैरत होती है कि ये कैसे इस संगठन में रह लेतीं हैं। जहां गालियों पर चटकारे लिए जाते हों, भारत माता के अलावा असहमत हर व्यक्ति की मां को सैक्सुअल ऑब्जेक्ट में तब्दील करने की छटपटाहट हो, वहां एक लड़की का एबीवीपी के पक्ष में खड़ा होना इस संगठन की सबसे अटपटी बात लगती है। इसलिए मैं मानता हूं कि जो भी लड़की एबीवीपी में है वो सारे सिद्धांतों और मूल्यों को छोड़कर सचमुच एबीवीपी के लिए दिल से समर्पित होगी! कोई गाली, कोई सवाल, कोई मसला और कोई हरकत शायद न उसे डिगा सके और न शायद समझा सके। आस्था किसी भी वैचारिक सवाल से नहीं डिगती!

वीसी की अपील!!
बुधवार को दिन में ही एबीवीपी ने अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल ख़त्म कर दी लेकिन गालियों की दुक़ान खोलकर बैठे लोगों का मंतव्य समझ से परे है कि जब उनके मुताबिक़ प्रशासन ने उनकी मांगे मान लीं, तो धरने पे बैठे किसलिए है? मांग प्रशासन ने मानी या एबीवीपी ने इससे कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि दोनों की रिपोर्टिंग अथॉरिटी एक ही है। सीधे-सीधे अगर कहा जाए तो दोनों के बीच रुठम-रुठाई के बाद समझौता हो गया। अगर एबीवीपी ने मानी तो सात दिनों का ड्रामा किसलिए? अगर प्रशासन ने मानी तो बाक़ी लोगों की क्यों नहीं मानी? बाक़ी लोगों की हड़ताल को 'असंवैधानिक' कैसे क़रार दिया? 

आठवीं रात जितने लोग फिर से एड ब्लॉक पर दिखे उससे शायद समझ में ये तो आया होगा  कि एचएलईसी की फ़र्जी रिपोर्ट की पोलपट्टी जेएनयू ही नहीं, बल्कि बाहर भी खुल चुकी है। मानवीय संवेदना की मैं न तो जगदेश कुमार से उम्मीद करता हू्ं और न ही लगता है कि वो मेरे इस भरोसे को झुठलाएंगे। वीसी ने 'स्वास्थ्य' की परवाह करते हुए भूख हड़ताल पर बैठे छात्र-छात्राओं को डायलॉग के लिए बुलाया और कहा कि एचएलईसी की रिपोर्ट को वे लोग मान लें। चलते-चलते एक सवल वीसी से पूछता हूं कि क्या आप इस फर्जी रिपोर्ट को मानते हैं? रिपोर्ट की सारी पड़ताल में बहत्तर छेद होने के बावजूद और इसके भी बावजूद कि वो आपके पक्ष में जाती है, क्या आपने सज़ा का ऐलान रिपोर्ट के आधार पर किया? रिपोर्ट में जिनका ज़िक्र तक नहीं है उनको किस आधार पर आपने सज़ा सुनाई? कोई तो आधार होगा? आप ये क्यों चाहते हैं कि आंदोलन करने वाले सारे लोग रिपोर्ट को मान लें और इकलौते आप उस रिपोर्ट से बढ़कर सज़ा सुनाए? कहां से ऐसा करने का आदेश मिला है? 
'बाहरियों' से आहत प्रशासन!

अमिता सिंह समेत जो दर्जन भर शिक्षक इस यूनिवर्सिटी को लगातार बदनाम करने में जुटे हैं और जो यहां के छात्र-छात्राओं के बारे में अश्लील और बेहद आपत्तिजनक बातें कहते रहे हैं, उनपर कार्रवाई क्यों नहीं करते आप? क्या इसलिए कि 'ऊपर वाले' ने ऐसा नहीं करने का आदेश दिया है? आप न स्टूडेंट्स की सुनते हैं, न शिक्षकों की और न ही कर्मचारियों की, तो आप सुनते किसकी हैं? जिनको इस वक़्त सुन-सुनकर आपने ये चैम्बर हासिल किया है वो आपकी सीवी ख़राब कर देंगे। इतिहास में आप किस तरह याद किया जाना पसंद करेंगे ये तय करने का आपके पास इस वक़्त एक मौक़ा है। सुधर जाएंगे वीसी साहब तो आपकी सीवी भी थोड़ी ठीक हो जाएगी वरना बीबीसी के एक इंटरव्यू में आरएसएस वाले सवाल पर आपकी जो सहमति भरी हिचकिचाहट थी, उससे हमें ये उम्मीद भी बेमानी लगती है। आप और एबीवीपी मिलकर जेएनयू को जो बनाना चाहते हैं उस आइडिया को वहां के स्टूडेंट्स ख़ारिज करते रहेंगे और एक दिन आपका कार्यकाल ख़त्म हो जाएगा। न यहां के रहेंगे और न वहां के।